शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

सनातन धर्म

SANATAN-DHARM-IMAGEसनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए कई बार इसे कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है. हालांकि, सच्चाई तो ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग कई बार इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं. सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है. न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ. यह तो अनादी काल से   प्रवहमान और विकसमान रहा. साथ ही यह केवल  एक द्रष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता. कोई एक विचार सर्वश्रेष्ठ हे  इसी वजह से कई सारे पूरक सिद्धांत भी बने. यही वजह है कि इसके खुलेपन की वजह से ही कई अलग नियम इस धर्म में हैं.अर्थात इसकी नरमाई ही  इस के पतन का कारण रही है.यही विशेषता इसे अधिक ग्राह्य और सूक्ष्म बनाती है. इसका मतलब यह है कि अधिक सरल दिमाग वाले इसे समझने में भूल कर सकते हैं. अधिक सूक्ष्म होने के साथ ही सनातन धर्म को समझने के कई चरण और प्रक्रियाएं हैं, जो इस सूक्ष्म सिद्धांत से पैदा होती हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सरल-सहज मस्तिष्क वाले इसे समझ ही नहीं सकते. पूरी गहराई में जानने के लिए भले ही हमें गहन और गतिशील समझदारी विकसित पड़े, लेकिन सामान्य लोगों के लिए भी इसके सरल और सहज सिद्धांत हैं. सनातन धर्म कई बार भ्रमित करनेवाला लगता है और इसके कई कारण हैं. अगर बिना इसके गहन अध्ययन के आप इसका विश्लेषण करना चाहेंगे, तो कभी समझ नहीं पाएंगे. इसका कारण यह कि सनातन धर्म सीमित आयामों या पहलुओं वाला धर्म नहीं है. यह सचमुच ज्ञान का समुद्र है. इसे समझने के लिए इसमें गहरे उतरना ही होगा.
सनातन धर्म के विविध आयामों को नहीं जान पाने की वजह से ही कई लोगों को लगता है कि सनातन धर्म के विविध मार्गदर्शक ग्रंथों में विरोधाभास पाते हैं. इस विरोधाभास का जवाब इसी से दिया जा सकता है कि ऐसा केवल सनातन धर्म में नहीं. कई बार तो विज्ञान में भी ऐसी बात आती है. जैसे, विज्ञान हमें बताता है कि शून्य तापमान पर पानी बर्फ बन जाता है. वही विज्ञान हमें यह भी बताता है कि पानी शून्य डिग्री से भी कम तापमान पर भी कुछ खास स्थितियों में अपने मूल स्वरूप में रह सकता है. इसका जो जवाब है, वही सनातन धर्म के संदर्भ में भी है. जैसे, विज्ञान के लिए दोनों ही तथ्य सही है, भले ही वह आपस में  विरोधाभासी हों,और विज्ञान को झुडलाते हों  उसी तरह सनातन धर्म भी अपने खुलेपन की वजह से कई सारे विरोधी विचारों को ख़ुद में समेटे रहता है.परन्तु सनातनधर्म में जो स्काई है उसे नकारा भी तो नही जा सकता  हम पहले भी कह चुके हैं-एकं सत, विप्रा बहुधा वदंति-उसी तरह किसी एक सत्य के भी कई सारे पहलू हो सकते हैं. कुछ ग्रंथ यह कह सकते हैं कि ज्ञान ही परम तत्व तक पहुंचने का रास्ता है, कुछ ग्रंथ कह सकते हैं कि भक्ति ही उस परमात्मा तक पहुंचूने का रास्ता है. सनातन धर्म में हर उस सत्य या तथ्य को जगह मिली है, जिनमें तनिक भी मूल्य और महत्व हो. इससे भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है. आप उसी रास्ते को अपनाएं जो आपके लिए सही और सहज हो. याद रखें कि एक रास्ता अगर आपके लिए सही है, तो दूसरे रास्ते या तथ्य ग़लत हैं. साथ ही, सनातन धर्म खुद को किसी दीवार या बंधन में नहीं बांधता है. ज़रूरी नहीं कि आप जन्म से ही सनातनी हैं. सनातन धर्म का ज्ञान जिस तरह किसी बंधन में नहीं बंधा है, उसी तरह सनातन धर्म खुद को किसी देश, भाषा या नस्ल के बंधन में नहीं बांधता. सच पूछिए तो युगों से लोग सनातन धर्म को अपना रहे हैं.सनातनधर्म के नियमों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाएतो मन स्वयम ही इसकी सचाई को मानने को तयार हो जाता हे .विज्ञान जिस तरहा बिना गयान  के अधूरा है .सनातन धर्म भी बिना ज्ञान हानि कारक है . ज्ञान मनुष्य के आस पास होता है.उसके भीतर होता है .इस का एक उदहारण देखिये 

हवन यग्य आदि का शास्त्रों में कोई विधि विधान कहा गया है .कि इसे किस महूर्त में किस आसन पर बैठ कर किस प्रकार के भोजन का इस्तेमाल करते हुए करना चाहिए .इतना सा ज्ञान तो कुछ पेचीदा नही है . परन्तु इस ज्ञान के बिना किये गये हवन यग्य हानीही करें गे यह ज्ञान भी पेचीदा नही है .देखने सुनने में आता हे कि अज्ञानी लोग प्रति दिन आर्यसमाज ,मन्दिरों ,घरों ,में नित्य-नियम बनाकर हवन यग्य आदि करते रहते हैं .जब अनिष्ट फल प्राप्त होता है .तब सनातन धर्म क़ी नरमाई का लाभ उठाते हुए सनातन धर्म का त्याग कर देते हैं .और इस पुरातन सनातन धर्म क़ी खामिया तलाश ने लगते है जब क़ी सनातन धर्म अपने आप में सम्पूर्ण सचा सुचा धर्म है .
                                       

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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

भगवान

मनुष्य को किसी भी दशा में पशु नहीं कहा जा सकता है। ईश्वर की रची सृष्टि में विभिन्न प्राणियों में से एक है मनुष्य, दूसरे हैं पशु और तीसरे हैं वनस्पति। इन तीनों के भी कई विभिन्न आकार व प्रकार होते  हैं, सब एक जैसे नहीं होते हैं।
शिशु 
हर मनुष्य जन्म के बाद कुछ समय तक पशुवत ही रहता है। उसकी बुद्धि का विकास नहीं हुआ होता। इसी कारण हम कहते हैं कि वह शिशु है। उसने अवश्य गलत किया है, किन्तु उसे छोड़ दो, कुछ न कहो, उसे क्षमा कर दो, क्योंकि उसमें बुद्धि-वृत्ति नहीं जगी होती है। मजे की बात तो यह है कि शिशु के मल-मूत्र से भी हम घृणा नहीं करते हैं, जैसे पशु के विषय में। वह शिशु जब थोड़ा बड़ा होता है, तब उसमें विवेक का जागरण होता है।विवेक ही ज्ञान है जिस को जान्ने के लिये किसी गुरु कि आवश्यकता नही पड़ी ,अंदर से स्वयम ही प्रकट होने लग गया 
अंदर ही अंदर से विवेक को जागृत करने वाली उस शक्ति का नाम ही ईश्वर,परमेश्वर,आल्हा ,अकाल्पुर्ख है 
इसी शक्ति को जगाना तपस्या करने के बराबर होता है , यदि इसी को गुरु मान लिया जावे तो भले बुरे का ज्ञान स्वयम ही होना शुरू हो जाता है ,तब मनुष्य ज्ञानी होजाता है 
ज्ञान दूध से निकला उस माखन के समान होता है जो दुबारा से ढूध नही बन सकता 
अतः भगवान से बड़ा कोई गुरु नही हो सकता उसके बराबर होना तो बहुत दूर की बात हो गी  कलयुग में ऐसे पाखंडी गुरुओं के ही दर्शन होते हैं ,उस गुरु भगवान के नही जब की कलयुग का ही कहना है कि यदि कोई सचे हृदय से भगवान को अपना गुरु मानता है तो हे प्रभु आप को उसे तुरंत दर्शन देने होंगे

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ

हिन्दू

  सनातन धर्म में हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई यही चारों धर्म आते हैं और जब भगवान इन धर्मों में जीव को जन्म देते हैं वह हिन्दू ही जन्मता है ,जन्मके बाद वह अपने अपने धर्म के संस्कारों के अनुसार हिन्दू मुसलमान सिख या इसाई बन जाता है जन्म के समय चारों धर्मों की निशानी (लिंग}एक समान एक रूप ही होता हे जिस के आधार पर यह कहा जासकता है कि जीव हिन्दू ही जन्मता हे और जिस दिन हिन्दू नही जन्मे गा वह समय पृथ्वी का आखरी समय होगा
                                                             जिसकी नीव पड चुकी है इन्ही चारों धर्मों के जीव धर्म परिवर्तन कर सनातन धर्म से बाहर खुद ही हो रहे हैं |जो नातो हिन्दू हैं नाही मुसलमान सिख या इसाई वह लोग फक्र के साथ खुद को निरंकारी -राधास्वामी -आर्य -समाजी और भी बहुत कुछ कहते हैं |

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

अवतार

अवतार

विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से

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'अवतार का अर्थ उतरना है। हिन्दू मान्यता के अनुसार जब जब दुष्टों का भार पृथ्वी पर बढ़ता है और धर्म की हानि होती है तब तब पापियों का संहार करके भक्तों की रक्षा करने के लिये भगवान अपने अंशावतारों व पूर्णावतारों से पृथ्वी पर शरीर धारण करते हैं।अवतार यानि अवतरित होना ना कि जन्म लेना ,प्रकट होना जिस प्रकार क्रोध प्रकट होता है  वह अवतरित नही होता उसे तो अहंकार जन्म देता है परन्तु अवतार का जन्म नही होता जन्म दो के संयोग से प्राप्त होता है ,जेसे अहंकार और इर्षा का संयोग क्रोध जन्मता है |अवतार केवल सनातन धर्म को अपनी लीला के द्वारा प्रेक्टिकली कर के दिखाता है |जो - जो कर्म अवतार करता है ,उसे अन्य सहायक अवतार नही कर पाते वह उनका बखान प्रचार करने वाले प्रचारक भर होते हैं बाकि रही बात अंश की हर जड़-चेतन भूत प्राणी उसी का अंश मात्र होता है |अवतार लेने के समय भगवान माया को अपने आधीन कर लेते हैं |

सुखसागर के अनुससार भगवान के निम्न अवतार हैं -
भगवान ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार ब्रह्मऋषियों का अवतार लिया। यह उनका पहला अवतार था।
पृथ्वी को रसातल से लाने के लिये भगवान ने दूसरी बार वाराह का अवतार लिया।
तीसरी बार ऋषियों को साश्वततंत्र, जिसे कि नारद पाँचरात्र भी कहते हैं और जिसमें कर्म बन्धनों से मुक्त होने का निरूपन है, का उपदेश देने के लिये नारद जी के रूप में अवतार लिया।
धर्म की पत्नी मूर्ति देवी के गर्भ से नारायण, जिन्होंने बदरीवन में जाकर घोर तपस्या की, का अवतरण हुआ। यह भगवान का चौथा अवतार है।
पाँचवाँ अवतार माता देवहूति के गर्भ से कपिल मुनि का हुआ जिन्होंने अपनी माता को सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया।
छठवें अवतार में अनुसुइया के गर्भ से दत्तात्रयेय प्रगट हुये जिन्होंने प्रह्लाद, अलर्क आदि को ब्रह्मज्ञान दिया।
सातवीं बार आकूति के गर्भ से यज्ञ नाम से अवतार धारण किया।
नाभिराजा की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के नाम से भगवान का आठवाँ अवतार हुआ। उन्होंने परमहँसी का उत्तम मार्ग का निरूपण किया।
नवीं बार राजा पृथु के रूप में भगवान ने अवतार लिया और गौरूपिणी पृथ्वी से अनेक औषधियों, रत्नों तथा अन्नों का दोहन किया।
चाक्षुषमन्वन्तर में सम्पूर्ण पृथ्वी के जलमग्न हो जाने पर पृथ्वी को नौका बना कर वैवश्वत मनु की रक्षा करने हेतु दसवीं बार भगवान ने मत्स्यावतार लिया।
समुद्र मंथन के समय देवता तथा असुरों की सहायता करने के लिये ग्यारहवीं बार भगवान ने कच्छप के रूप में अवतार लिया।
बारहवाँ अवतार भगवान ने धन्वन्तरि के नाम से लिया जिन्होंने समुद्र से अमृत का घट निकाल कर देवताओं को दिया।
मोहिनी का रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाने के लिये भगवान ने तेरहवाँ अवतार लिया।
चौदहवाँ अवतार भगवान का नृसिंह के रूप में हुआ जिन्होंने हिरण्यकश्यपु दैत्य को मार कर प्रह्लाद की रक्षा की।
दैत्य बलि को पाताल भेज कर देवराज इन्द्र को स्वर्ग का राज्य प्रदान करने हेतु पन्द्रहवीं बार भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया।
अभिमानी क्षत्रिय राजाओं का इक्कीस बार विनाश करने के लिये सोलहवीं बार परशुराम के रूप में अवतार लिया।
सत्रहवीं बार पाराशर जी के द्वारा सत्यवती के गर्भ से भगवान ने वेदव्यास के रूप में अवतार धारण किया जिन्होंने वेदों का विभाजन कर के अने उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया।
राम के रूप में भगवान ने अठारहवीं बार अवतार ले कर रावण के अत्याचार से विप्रों, धेनुओं, देवताओं और संतों की रक्षा की।
उन्नसवीं बार भगवान ने सम्पूर्ण कलाओं से युक्त कृष्ण के रूप में अवतार लिया।
बुद्ध के रूप में भगवान का बीसवाँ अवतार हुआ।
कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

Asaram बापू

Asaram बापू
जन्म लेना1941 अप्रैल 17 (उम्र 68) 
Berani, सिंध, ब्रिटिश भारत
निवासअहमदाबाद, भारत
राष्ट्रीयताभारतीय
धर्महिंदू धर्म
पति (s)लक्ष्मी देवी
बच्चेनारायण साई बेटा () 
भारती देवी बेटी ()
माता पिताMehangiba माँ () 
Thaumal Sirumalani पिताजी ()
हस्ताक्षर
वेबसाइट 
www.ashram.org